उसका चेहरा आज भी रोश्नी में ऐसे चमकता है जैसे सर्दी की सुबह, वो पहली धुप जब घांस की सतह को छुती है तो ओस की बुंदे मेतीयों की तरह चमक उठती हैं। हॉ उसका चेहरा वैसा ही है। शबनम की तरह सफाफ, गीली मिट्टी की तरह ताज़ा दम। उस मुलायम रूई की तरह जिसको हाथ मे ले कर दिल करता है भींच लु और अंदर तक समों लु।

वो, वो मेरे ख्यालों की एक किताब है। मेरे तसव्वुरात का निसाब। मैने कभी उसको ख्वाबों की सफ्हों से उतरते नही देखा। मेरे ख्याल उस से एक लम्हे के लिए भी गाफिल नही होते। मैं उसको पढ़ता जाता हुं और वो मुझ पर अयॉ होता जाता है। माहपारों की शोखियॉ लिए तो कभी फरिश्तों की खामोशियॉ लिए। हर इबारत जैसे उसी से शुरू होती है और फिर उसी पर खत्म हो जाती है। कुछ सुझता नही है। कुछ दिखाई नही देता। रोश्नी की हर लकीर जैसे उसका अक्स मेरे कमरे में ले आती है। रात की तन्हाईयों मे मैं उसे छुने की नाकाम कोशीशे करता हुं। यही तो थी वो अभी। चन्द लम्हों पहले। तकीये पर सर रखे मेरे फोन पर दावा करती। और फिर मुझसे लिपट कर कहती हुई, कभी छोड़ कर मत जाना। मैं अभी तक उसी तकीये पर लेटा उसके लम्स को ढुंढ रहा हुं। पकड़ता हुं। मसहरी के पाये पर उसके पैरों के निशान शायद बीते दीनों की धुल में गुम हो गये हैं। साफ करता जाता हुं और उन खाली जगहों में देखता जाता हुं। अपना सर टिकाये हुए, काफी पीने की ज़िद करते हुए। उसी ने तो सिखाया था मुझे की काफी कैसे बनाते हैं।

अचानक से ख्याल आया उसकी याद का एक मुस्कुराता हुआ पहलु। और मैं बिस्तर को पलटने लगा। ढुंढने लगा। कभी बिस्तर के कोने पर हाथ फिराता तो कभी नीचे हाथ डाल कर देखता। दिल कहता की कही न कहीं एक टुकड़ा फंसा होगा। हॉ चिवींग गम का। वो अक्सर इधर उधर बिस्तर के किसी भी हिस्से पर चिपका देती थी। मैने सोचा शायद उसके मुंह का ज़ायका कही उस चिवींग गम पर ज़रूर होगा। बहुत ढुंढा पर मिला नही, शायद मुहब्बत की तरह, एक सुखे हुए पत्ते की मानिन्द गर्द मे अटा हुआ, समेटा हुआ किसी रोज़ बाई ने कुड़े के साथ फेंक दिया होगा। और ये सोचते सोचते मैं चुप चाप आंख बंद किये पड़ा उसके चेहरे को यादों में देखता निंद के आगोश में डुबता चला गया।

اُسکا چہرا اج بھی روشنی میں ایسے چمکتا ہے جیسے سردی کی صبح، وہ پہلی دھوپ جب گھانس کی ستح کو چھوتی ہے تو اُس کی بندیں موتیوں کی طرح چمک اٹھتی ہیں۔ ہاں اسکا چہرا ویسا ہی ہے۔ شبنم کی طرح شفاف، گیلی مٹّی کی طرح تازا دم۔ اس ملایم روئ کی طرح جسکو ہاتھ میں لے کر دل چاہتا ہے بھیچ لوں اور اندر تک سمو لوں۔
وہ، وہ میرے خیالوں کی ایک کتاب ہے۔ میرے تصّورات کا نساب۔ مینے کبھی اسکو خوابوں کی سفہوں سے اترتے نہیں دیکھا۔ میرے خیال اس سے ایک لمہے کے لیے بھی غافل نہیں ہوتے۔ میں اسکو پڈھتا جاتا ہوں اور وہ مجھ پر ایاں ہوتا جاتا ہے۔ ماہپاروں کی شوخیاں لیے تو کبھی فرشتوں کی خاموشیاں لیے۔ ہر ابارت جیسے اسی سے شروع ہوتی ہےاور پھر اسی پر ختم ہو جاتی ہے۔ کچھ سوجھتا نہی ہے۔ کچھ دکھائ نہی دیتا۔ روشنی کی ہر لکیر جیسے اسکا اکس کمرے میں لے اتی ہے۔ رات کی تنہایوں مے میں اسے چھونے کی ناکام کوششیں کرتا ہوں۔ یہی تو تھی وہ ابھی۔ چند لمہوں پہلے۔ تکیے پر سر رکھے میرے فون پر داوا کرتی۔ اور پھر مجھسے لپٹ کر کہتی، مجھے کبھی چھوڑ کر مت جانا۔ میں ابھی تک اسی تکیے پر لیٹا اسکے لمس ڈھونڈھ رہا ہوں۔ پکڑتا ہوں۔ مسحری کے پاے پر اسکےپیروں کے نشان شاید بیتے ہوے دنوں کی دُھول میں گم ہو گے ہیں۔ ساف کرتا جاتا ہوں اور ان خالی جگہوں میں دیکھتا جاتا ہوں۔ اپنا سر ٹکاے ہوے کافی پینے کی ضد کرتے ہوے۔ اسی نے تو سکھایا تھا کی کافی کیسے بناتے ہیں۔
اچانک سے خیال َایا اسکی یاد کا ایک پہلو۔ اور میں بستر کو پلٹنے لگا۔ ڈھونڈنے لگا۔ کبھی بستر کے کونے پر ہاتھ پھراتا تو کبھی نیچے ہاتھ ڈال کر دیکھتا۔ دل کہتا کی کہیں نہ کہی ایک ٹکڑا پھنسا ہوگا۔ ہاں چونگ گم کا۔ وہ اکسر بستر کےکسی حصّے پر اِدھر اُدھر چپکا دیا کرتی تھی۔ میں نے سوچا اسکے منہ کا ذاءکہ ابھی بھی چونگ گم پر ضرور ہوگا۔ بہت ڈنڈھا پر ملا نہیں۔ شاید محبت کی طرح، ایک سوکھے ہوے پتّے کی مانند، گرد میں اٹاہوا کسی دن بائ نے کوڑے کی طرح پھینک دیا ہوگا۔ اور یہ سوچتیے سوچتے چپ چاپ اَنکھ بند کیے پڑا یادوں میں اسکے چہرے کو دیکھتے میں نیند کے اگوش میں ڈوبتا چلا گیا۔

 

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